उम्मीद के विपरीत उन्होंने बात करने में पहल करते हुए कहा, "हमारे महाव गाँव को नज़र लग गई. जो बात बातचीत से सुलझ रही थी, नेतागीरी के चक्कर में योगेश राज जैसे बाहरवालों ने उसे बिगाड़ डाला."
3 दिसंबर की सुबह प्रेमजीत के बगल वाले बाग में गायों के कंकाल मिलने के बाद इलाक़े में तनाव फैल गया था.
पास के चिंगरावटी थाने का घेराव करने के बाद गुस्साई भीड़ ने आगज़नी की और पुलिसवालों को जान बचाने के लिए भागना पड़ा.
हिंसा में स्याना थाने के इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और भीड़ का हिस्सा रहे युवक सुमित की गोली लगने से मौत हो गई थी.
हिंसा के मामले में 20 लोग गिरफ़्तार किए गए हैं जिनमें जीतू फ़ौजी समेत अधिकांश महाव गाँव के युवक हैं.
घटनास्थल से महज़ डेढ़ किलोमीटर दूर महाव के दर्जनों लोग गोकशी का विरोध और दोषियों के ख़िलाफ़ ऐक्शन लेने की माँग करते थाने तक आए थे.
प्रेमजीत इन दिनों डरते-डरते खेतों में गन्ने की कटाई करवाते हैं क्योंकि उन्हें डर है पुलिस कहीं उन्हें भी न "उठा ले जाए."
बेटी दिल्ली की एक कंपनी में बिज़नेस डेवलपमेंट मैनेजर है लेकिन अपनी शादी की तारीख़ नज़दीक आने पर भी यहाँ आने को तैयार नहीं.
प्रेमजीत ने कहा, "रिश्तेदार या बेटी के मित्र अब यहाँ आने से डर रहे हैं. हमारी ज़िन्दगी बर्बादी की कगार पर आ पहुँची है लेकिन हिंसा के मुख्य आरोपी अभी भी फ़रार क्यों हैं? हमारे गाँव पर पुलिस का ग़ुस्सा उमड़ पड़ा, लोग पीटे गए पर असल आरोपियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?"
"विधायक देवेंद्र सिंह लोधी के अलावा हमसे मिलने भी कोई न आया. चुनाव के समय तो सभी चक्कर लगाते रहते हैं", कह कर प्रेमजीत दोबारा खेत की तरफ़ लौट गए.
"तै कोतवाल को मारेगा? हिम्मत देख इनकी, भई. अब आँसू बहावे से कुछ न होना, जज साहब के सामने बात कीजो".
एक कठोर सी शक्ल वाला पुलिसवाला तीन लोगों के हाथों की हथकड़ियों को एक मोटी रस्सी से बाँधते हुए ये बातें कर रहा था.
ब्रांडेड जींस, जूते और जैकेट पहने तीन नौजवानों में से दो सिसक-सिसक कर रो रहे थे.
महाव गाँव से पच्चीस मिनट की दूरी पर है स्याना जिसकी कोतवाली में बुधवार दोपहर काफ़ी चहल-पहल थी.
मंगलवार शाम इनकी गिरफ़्तारी हुई है क्योंकि चिंगरावठी में हुई हिंसा के बाद वीडियो फ़ुटेज की मदद से जिन 28 लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द एफ़ाईआर हुई हैं, उनमें ये तीनों शामिल हैं और अभी तक फ़रार थे.
Friday, December 21, 2018
Thursday, December 6, 2018
'उजाड़ प्रयागराज' में कैसे दिखेगी कुंभ की रौनक
प्रयागराज शहर के भीतर प्रवेश करते ही चाहे जिस दिशा में जाइए, आपका सामना टूटी-फूटी सड़कों, सड़कों के किनारे टूटे-फूटे मकान और दुकान, आस-पास बेतरतीब बिखरे पड़े मलबे और ऊपर उड़ते धूल के ग़ुबार से ही होगा.
इस दौरान शहर का इतिहास तक बदल गया यानी, इलाहाबाद प्रयागराज हो गया. छह साल के अंतराल पर आने वाला अर्धकुंभ, कुंभ हो गया और बारह साल बाद आने वाला कुंभ बदलकर महाकुंभ हो गया. लेकिन शहर को सुंदर बनाने के लिए तोड़-फोड़ का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो तीस नवंबर की डेडलाइन ख़त्म होने के बावजूद अंजाम तक नहीं पहुंच पाया है.
कुंभ मेला शुरू होने में अब महज़ एक महीना बचा है.
गंगा किनारे 'तंबुओं का शहर' बसना शुरू हो गया है लेकिन रेतीली धरती पर बने उस अस्थायी शहर को प्राणवायु देने वाले इस स्थाई शहर की सांस जैसे धूल के ग़ुबार में अटकी हुई है. शहर के लोगों का ही नहीं, अब तो हाईकोर्ट का भी धैर्य जवाब देने लगा है.
ल के ग़ुबार के ढका हुआ है शहर
एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान चार दिन पहले हाईकोर्ट ने सख़्त टिप्पणी की. कहा, "क्या राज्य सरकार कार्यों की मॉनिटरिंग नहीं कर रही है? जिस तरह से काम हो रहा है, कुंभ मेले तक इसके पूरा होने की उम्मीद नहीं दिखती. पूरा शहर धूल के ग़ुबार से भरा हुआ है."
यही सवाल शहर का हर बाशिंदा पूछ रहा है.
रेलवे स्टेशन से मुख्य शहर को जाने वाली सड़क लीडर रोड पर जॉनसेनगंज चौराहा शहर के सबसे पुराने, व्यस्ततम और प्रमुख चौराहों के रूप में जाना जाता है. सड़क चौड़ी करने के लिए इस चौराहे के चारों कोनों की इमारतें गिरा दी गई हैं और किनारे के मकान और दुकान के जो हिस्से इसमें अवरोध पैदा कर रहे थे, उन्हें भी ढहा दिया गया है.
'सड़क चौड़ी होने से लोगों को आराम मिलेगा, ट्रैफ़िक जाम की समस्या से राहत मिलेगी और शहर सुंदर लगेगा.'
इस बात से कोई इनक़ार नहीं कर रहा है लेकिन तीन महीने पहले ढहाई गई इमारतों का मलबा तक अभी नहीं हटाया गया है, इससे लोग ख़ासे परेशान हैं.
जॉनसेनगंज चौराहे से चौक की ओर जाने वाली सड़क के बाएं कोने पर एक छोटा लेकिन काफी पुराना मंदिर है. मंदिर के ठीक बगल में विद्यानंद दुबे की छोटी सी पान की दुकान है.
वो बताते हैं, "किसी समय में ये इलाहाबाद का सबसे मुख्य चौराहा था लेकिन आज इसकी दुर्गति देख लीजिए. लगभग एक साल से यहां कुछ न कुछ काम चल रहा है जिसकी वजह से नालियां जाम हो गई हैं और मंदिर के चारों ओर नाली का पानी भर गया है. लोगों का दर्शन करना मुश्किल हो रहा है."
इस दौरान शहर का इतिहास तक बदल गया यानी, इलाहाबाद प्रयागराज हो गया. छह साल के अंतराल पर आने वाला अर्धकुंभ, कुंभ हो गया और बारह साल बाद आने वाला कुंभ बदलकर महाकुंभ हो गया. लेकिन शहर को सुंदर बनाने के लिए तोड़-फोड़ का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो तीस नवंबर की डेडलाइन ख़त्म होने के बावजूद अंजाम तक नहीं पहुंच पाया है.
कुंभ मेला शुरू होने में अब महज़ एक महीना बचा है.
गंगा किनारे 'तंबुओं का शहर' बसना शुरू हो गया है लेकिन रेतीली धरती पर बने उस अस्थायी शहर को प्राणवायु देने वाले इस स्थाई शहर की सांस जैसे धूल के ग़ुबार में अटकी हुई है. शहर के लोगों का ही नहीं, अब तो हाईकोर्ट का भी धैर्य जवाब देने लगा है.
ल के ग़ुबार के ढका हुआ है शहर
एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान चार दिन पहले हाईकोर्ट ने सख़्त टिप्पणी की. कहा, "क्या राज्य सरकार कार्यों की मॉनिटरिंग नहीं कर रही है? जिस तरह से काम हो रहा है, कुंभ मेले तक इसके पूरा होने की उम्मीद नहीं दिखती. पूरा शहर धूल के ग़ुबार से भरा हुआ है."
यही सवाल शहर का हर बाशिंदा पूछ रहा है.
रेलवे स्टेशन से मुख्य शहर को जाने वाली सड़क लीडर रोड पर जॉनसेनगंज चौराहा शहर के सबसे पुराने, व्यस्ततम और प्रमुख चौराहों के रूप में जाना जाता है. सड़क चौड़ी करने के लिए इस चौराहे के चारों कोनों की इमारतें गिरा दी गई हैं और किनारे के मकान और दुकान के जो हिस्से इसमें अवरोध पैदा कर रहे थे, उन्हें भी ढहा दिया गया है.
'सड़क चौड़ी होने से लोगों को आराम मिलेगा, ट्रैफ़िक जाम की समस्या से राहत मिलेगी और शहर सुंदर लगेगा.'
इस बात से कोई इनक़ार नहीं कर रहा है लेकिन तीन महीने पहले ढहाई गई इमारतों का मलबा तक अभी नहीं हटाया गया है, इससे लोग ख़ासे परेशान हैं.
जॉनसेनगंज चौराहे से चौक की ओर जाने वाली सड़क के बाएं कोने पर एक छोटा लेकिन काफी पुराना मंदिर है. मंदिर के ठीक बगल में विद्यानंद दुबे की छोटी सी पान की दुकान है.
वो बताते हैं, "किसी समय में ये इलाहाबाद का सबसे मुख्य चौराहा था लेकिन आज इसकी दुर्गति देख लीजिए. लगभग एक साल से यहां कुछ न कुछ काम चल रहा है जिसकी वजह से नालियां जाम हो गई हैं और मंदिर के चारों ओर नाली का पानी भर गया है. लोगों का दर्शन करना मुश्किल हो रहा है."
Monday, December 3, 2018
तेलंगाना चुनाव: हवा का रुख़ बदल रहा है!
तेलंगाना में 7 दिसंबर को होनेवाले चुनाव पर पूरे देश की नज़रें हैं क्योंकि ये चुनाव कहीं ना कहीं 2019 के महा-संग्राम पर असर डालेगा.
तीन महीने पहले तक ये लग रहा था कि तेलंगाना चुनाव की रेस में सिर्फ एक ही उम्मीदवार है. तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता और मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को जीता हुआ मान लिया गया था.
लेकिन अब तस्वीर कुछ बदल चुकी है. अब ये चुनाव दंगल में बदल चुका है, जहां मुक़ाबला आसान नहीं है.
लेकिन तीन महीने में ऐसा क्या हुआ कि ये चुनावी रण इस कदर दिलचस्प हो गया.
कांग्रेस ने तेल्गु देशम पार्टी और दूसरी छोटी पार्टियों के साथ मिलकर पीपुल्स फ्रंट बनाया, जिसे चंद्रशेखर राव के सामने एक कड़ी चुनौती माना जा रहा है.
अगर ये प्रयोग सफल हो जाता है तो राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है.
इससे ये संदेश पूरे देश में जाएगा कि 2019 के आम चुनाव में बीजेपी-विरोधी पार्टियां मिलकर मोदी को हराने का माद्दा रखती हैं.
इससे राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन बनाने की कोशिशों को बल मिलेगा और राज्य स्तर पर भी पार्टियां एक साथ आएंगी.
ये आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू की भी बड़ी जीत होगी, जो 2019 में मोदी को हराने के लिए सभी ग़ैर बीजेपी पार्टियों को एकजुट करने की कोशिशों में लगे हैं.
तेलंगाना की 119 सीटों पर होने वाले चुनाव के तीन दावेदार हैं, उनमें से बीजेपी तीसरे नंबर पर है.
ये चुनाव केसीआर के लिए कितना चुनौतीपूर्ण है उसका अंदाज़ा चुनाव सर्वेक्षणों से मिलता है.
इनमें किसी में भी केसीआर को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिखाया गया है और कहा गया है कि पीपुल्स फ्रंट केसीआर की पार्टी को कड़ी टक्कर देने वाला है.
यहां तक की सट्टा बाज़ारों में भी माहौल टीआरएस के ख़िलाफ़ बनता ही दिख रहा है.
शुरुआत में केसीआर दावा कर रहे थे कि उसकी पार्टी 100 से ज़्यादा सीटों की बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी, लेकिन अब उनके दावों का दम निकलने लगा है.
वो ख़ुद ही अपनी हार की बातें करने लगे हैं. अपनी एक चुनावी रैली में उन्होंने कहा, "अगर टीआरएस हार जाती है तो मेरा कोई नुक़सान नहीं होगा. मैं चला जाऊंगा और अपने फ़ार्महाउस में आराम करूंगा."
ऐसा लग रहा है कि वो जनता से कह रहे हैं कि उन्होंने साढ़े चार साल अच्छा काम किया है, इसलिए अब उन्हें सत्ता में वापस लाना जनता का दायित्व है.
2014 में वो देश के सबसे युवा राज्य के मुख्यमंत्री बने थे. उनकी सरकार को लोगों की बेहतरी के लिए काम करने वाली सरकार माना जाता है.
कई लोग इसे लोकप्रिय सरकार कहते हैं जिसने कल्याणकारी योजनाओं के लिए 52000 करोड़ खर्च किए.
इस सरकार ने गरीब लड़कियों की शादी के लिए आर्थिक मदद देना, किसानों की आर्थिक मदद, किसानों की हर ज़रूरत को लगातार पूरा करना, विधवाओं और बेसहारा, विकलांग और बूढ़े लोगों की पेंशन में बढ़ोत्तरी करना जैसी तमाम योजनाएं चलाईं.
तीन महीने पहले तक ये लग रहा था कि तेलंगाना चुनाव की रेस में सिर्फ एक ही उम्मीदवार है. तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता और मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को जीता हुआ मान लिया गया था.
लेकिन अब तस्वीर कुछ बदल चुकी है. अब ये चुनाव दंगल में बदल चुका है, जहां मुक़ाबला आसान नहीं है.
लेकिन तीन महीने में ऐसा क्या हुआ कि ये चुनावी रण इस कदर दिलचस्प हो गया.
कांग्रेस ने तेल्गु देशम पार्टी और दूसरी छोटी पार्टियों के साथ मिलकर पीपुल्स फ्रंट बनाया, जिसे चंद्रशेखर राव के सामने एक कड़ी चुनौती माना जा रहा है.
अगर ये प्रयोग सफल हो जाता है तो राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है.
इससे ये संदेश पूरे देश में जाएगा कि 2019 के आम चुनाव में बीजेपी-विरोधी पार्टियां मिलकर मोदी को हराने का माद्दा रखती हैं.
इससे राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन बनाने की कोशिशों को बल मिलेगा और राज्य स्तर पर भी पार्टियां एक साथ आएंगी.
ये आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू की भी बड़ी जीत होगी, जो 2019 में मोदी को हराने के लिए सभी ग़ैर बीजेपी पार्टियों को एकजुट करने की कोशिशों में लगे हैं.
तेलंगाना की 119 सीटों पर होने वाले चुनाव के तीन दावेदार हैं, उनमें से बीजेपी तीसरे नंबर पर है.
ये चुनाव केसीआर के लिए कितना चुनौतीपूर्ण है उसका अंदाज़ा चुनाव सर्वेक्षणों से मिलता है.
इनमें किसी में भी केसीआर को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिखाया गया है और कहा गया है कि पीपुल्स फ्रंट केसीआर की पार्टी को कड़ी टक्कर देने वाला है.
यहां तक की सट्टा बाज़ारों में भी माहौल टीआरएस के ख़िलाफ़ बनता ही दिख रहा है.
शुरुआत में केसीआर दावा कर रहे थे कि उसकी पार्टी 100 से ज़्यादा सीटों की बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी, लेकिन अब उनके दावों का दम निकलने लगा है.
वो ख़ुद ही अपनी हार की बातें करने लगे हैं. अपनी एक चुनावी रैली में उन्होंने कहा, "अगर टीआरएस हार जाती है तो मेरा कोई नुक़सान नहीं होगा. मैं चला जाऊंगा और अपने फ़ार्महाउस में आराम करूंगा."
ऐसा लग रहा है कि वो जनता से कह रहे हैं कि उन्होंने साढ़े चार साल अच्छा काम किया है, इसलिए अब उन्हें सत्ता में वापस लाना जनता का दायित्व है.
2014 में वो देश के सबसे युवा राज्य के मुख्यमंत्री बने थे. उनकी सरकार को लोगों की बेहतरी के लिए काम करने वाली सरकार माना जाता है.
कई लोग इसे लोकप्रिय सरकार कहते हैं जिसने कल्याणकारी योजनाओं के लिए 52000 करोड़ खर्च किए.
इस सरकार ने गरीब लड़कियों की शादी के लिए आर्थिक मदद देना, किसानों की आर्थिक मदद, किसानों की हर ज़रूरत को लगातार पूरा करना, विधवाओं और बेसहारा, विकलांग और बूढ़े लोगों की पेंशन में बढ़ोत्तरी करना जैसी तमाम योजनाएं चलाईं.
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