Wednesday, January 30, 2019

ब्रेक्ज़िटः प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे को मिली संसद में राहत

ब्रितानी प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे को बीते साल नवंबर में यूरोपीय संघ के साथ हुए ब्रेक्ज़िट समझौते पर फिर से वार्ता करने की योजना के लिए सांसदों का समर्थन मिल गया है.

कंज़रवेटिव पार्टी के सांसद ग्राहम ब्रेडी के प्रस्ताव पर हुए मतदान में प्रधानमंत्री के समर्थन में 16 अधिक वोट पड़े.

ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने की तारीख़ नज़दीक आ रही है लेकिन अलग होने का कोई स्पष्ट रास्ता अभी दिख नहीं रहा है.

प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे का मूल समझौता संसद से पारित नहीं हो सका था. हालांकि वो लेबर पार्टी की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव में जीत गईं थीं.

टेरीज़ा मे ने सांसदों से अपील की थी कि वो उन्हें यूरोपीय संघ के साथ फिर से समझौता करने का मौका दें. अब ये मौका संसद ने उन्हें दे दिया है.

ब्रितानी प्रधानमंत्री ने अपने समझौते में कई संशोधन करने के प्रस्ताव सदन में पेश किए जिन्हें सांसदों का समर्थन मिल गया है.

भेल ही टेरीज़ा मे को फिर से बात करने की मंज़ूरी अपने देश की संसद से मिल गई है मगर यूरोपीय संघ का कहना है कि वो ब्रितानी प्रधानमंत्री के साथ हुए समझौते की क़ानूनी भाषा को नहीं बदलेगा.

प्रधानमंत्री मे का कहना है कि यूरोपीय संघ से वार्ता के बाद उनका संशोधित समझौता जल्द से जल्द मतदान के लिए संसद के निचले सदन में पेश किया जाएगा.

संसद ने बिना समझौते के यूरोपीय संघ से अलग होने के ख़िलाफ़ लाए गए संशोधन को भी पारित कर दिया.

हालांकि ये अनिवार्य रूप से लागू नहीं होगा और यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने की तारीख़ अभी भी 29 मार्च ही बनी हुई है.

इसी बीच लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कोर्बिन ने कहा है कि वो प्रधानमंत्री से मिलकर नए हालात पर चर्चा करेंगे.

ब्रिटेन की जनता ने एक जनतमतसंग्रह में यूरोपीय संघ से अलग होने का फ़ैसला लिया था.

ब्रिटेन को मार्च के अंत तक यूरोपीय संघ से अलग होना है. प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे चाहती हैं कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ के साथ समझौता करके अलग हो.

इसी बीच यूरोपीय संघ के अध्यक्ष डोनल्ड टुस्क ने कहा है कि ब्रिटेन के साथ तय हुए समझौते पर फिर से वार्ता नहीं की जाएगी और मौजूदा हालात में ब्रिटेन के यूरोप से अलग होने का यही सबसे सही और एकमात्र रास्ता बचा है.

Tuesday, January 22, 2019

क्या दिल्ली और पंजाब में 'आप' का अस्तित्व दाँव पर है?- नज़रिया

पिछले लोकसभा चुनाव के ठीक पहले देश की राजनीति में नरेन्द्र मोदी के 'भव्य-भारत की कहानी' और उसके समांतर आम आदमी पार्टी 'नई राजनीति के स्वप्न' लेकर सामने आई थी.

दोनों की अग्नि-परीक्षा अब इस साल लोकसभा चुनावों में होगी. दोनों की रणनीतियाँ इसबार बदली हुई होंगी.

ज़्यादा बड़ी परीक्षा 'आप' की है, जिसका मुक़ाबला बीजेपी के अलावा कांग्रेस से भी है. दिल्ली और पंजाब तक सीमित होने के कारण उसका अस्तित्व भी दाँव पर है.

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने पिछले रविवार को बरनाला से पंजाब में पार्टी के लोकसभा चुनाव अभियान की शुरूआत की है. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी राज्य की सभी 13 सीटों पर अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी.

हाल में हुई पार्टी की कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठकों में फ़ैसला किया गया कि 2014 की तरह इस बार हम सभी सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेंगे.

पार्टी का फोकस अभी सिर्फ़ 33 सीटों पर है (दिल्ली में 7, पंजाब में 13, हरियाणा में10, गोवा में 2 और चंडीगढ़ में एक ). ज्यादातर जगहों पर उसका बीजेपी के अलावा कांग्रेस से भी मुक़ाबला है.

कुछ महीने पहले तक पार्टी कोशिश कर रही थी कि किसी तरह से कांग्रेस के साथ समझौता हो जाए, पर अब नहीं लगता कि समझौता होगा. दूसरी तरफ़ वह बीजेपी-विरोधी महागठबंधन के साथ भी है, जो अभी अवधारणा है, स्थूल गठबंधन नहीं.

'आप' ने अपनी राजनीति का फोकस बीजेपी-विरोध पर केंद्रित कर दिया है. इस वजह से जाने-अनजाने यह पार्टी कांग्रेस की प्रतिस्पर्धी भी बन गई है. अपनी वृहत राजनीति के कारण बीजेपी-विरोध के केंद्र में कांग्रेस ने अपनी जगह बना ली है. इस लिहाज़ से दोनों का उद्देश्य समान है. पर अंतर्विरोध है कि 'आप' पंजाब में कांग्रेस की विरोधी पार्टी है.

उधर, कांग्रेस की दिलचस्पी दिल्ली और हरियाणा में वापसी करने में है. कुल मिलाकर तीनों जगह पर 'आप' उसकी सहायक नहीं विरोधी पार्टी है.

महागठबंधन के दलों को 'आप' दो कारणों से रोचक लगती है. इसका जन्म 2011-12 में चले भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के गर्भ से हुआ था, जिसके कारण इसने कुछ अपेक्षाएं पैदा कीं. विरोधी दलों को इसकी यह छवि पसंद आई.

अरविंद केजरीवाल ने खुद को नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ जिस तरीक़े से खड़ा किया, वह भी विरोधी दलों को पसंद आया. पर यह पार्टी तीन राज्यों के अलावा कहीं और पैठ नहीं बना पाई है. विरोधी दलों के बीच केजरीवाल की उपस्थिति सजावटी ज़्यादा होती है, व्यावहारिक कम.

पिछले चार-पाँच साल की राजनीति पर नज़र डालने से लगता है कि 'आप' का उद्देश्य अपने आप को बीजेपी-विरोधी साबित करना है, ताकि मुसलमानों और बीजेपी-विरोधी अन्य सामाजिक समूहों का वोट उसे मिले. यह सत्ता-उन्मुखी राजनीति की समझ है, सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनकारी समझ नहीं है.

पार्टी के पास दिल्ली का प्रशासनिक अनुभव भी है, जिसके संदर्भ में केजरीवाल ने संगरूर में कहा कि हमने दिल्ली में जिस प्रकार अच्छे-अच्छे काम किए हैं, उसी की तरह पंजाब की भी तस्वीर बदलने के लिए भी हमारे पास दूरदर्शी सोच है. दिल्ली के विकास मॉडल को लेकर ही आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब में उतरेगी.

पिछले तीन-चार साल में पार्टी में कई बार टूट हुई है. पार्टी राज्य में जिस तीसरे मोर्चे की बात कर रही थी, वह अब चौथे मोर्चे में तब्दील हो गया है. कोई बात ज़रूर है कि उसके शुरुआती नेताओं में से आधे से ज़्यादा आज उसके सबसे मुखर विरोधियों की क़तार में खड़े हैं.

दिल्ली के बाद इनका दूसरा सबसे अच्छा केंद्र पंजाब में था. सुच्चा सिंह छोटेपुर जैसे नेता कभी 'आप' का नेतृत्व करते थे. पार्टी से निकले सुखपाल सिंह खैरा, डॉ धर्मवीर गांधी और बैंस बंधु बलविंदर सिंह बैंस और सिमरजीत सिंह बैंस नया मोर्चा बनाने जा रहे हैं.

पार्टी अपने दो मौजूदा सांसदों भगवंत मान (संगरूर) और साधु सिंह (फरीदकोट) को फिर से मैदान में उतारने जा रही है, पर इनका मुक़ाबला शायद अपनी ही पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं से होगा.

इस महीने पंजाब में सुखपाल सिंह खैरा, एचएस फ़ुल्का और बलदेव सिंह ने पार्टी छोड़ी है. तीनों के अलग-अलग कारण रहे होंगे, पर संदेश एक है. जैसा सोचा था वैसा इस पार्टी में नहीं हुआ.

पार्टी की टूट पर अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि उनका संगठन शुद्ध होता जा रहा है. पार्टी छोड़ने वालों को लालची बताते हुए उन्होंने बरनाला रैली में कहा कि जिन्हें जाना था, वे चले गए. अब पार्टी की मज़बूती को कोई ख़तरा नहीं.

उधर पार्टी छोड़ने वाले एक नेता ने कहा, "आम आदमी पार्टी अब अकेला आदमी पार्टी बनती जा रही है." बलदेव सिंह ने पार्टी छोड़ते हुए कहा, "पंजाब में यह पार्टी बाहरी लोगों की फौज बन गई है, जिसके मुखिया दो बाहरी सूबेदार हैं, जो अपने क़रीबियों को बढ़ाने में लगे हैं."

इसे आम आदमी पार्टी की अवधारणा की उपलब्धि माना जाएगा कि देखते ही देखते देश के हर कोने में वैसा ही संगठन खड़ा करने की कामनाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया. न केवल देश में बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से ख़बरें आईं कि वहाँ भी ऐसी ही कोई पार्टी बनाने की माँग हो रही है.

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पार्टी में शामिल होने के लिए देश-विदेश की बड़ी-बड़ी कम्पनियों की नौकरियाँ छोड़कर नौजवान आने लगे. अरुणा रॉय से लेकर मेधा पाटकर और मीरा सान्याल तक अलग-अलग सामाजिक-सांस्कृतिक रंगत वाले लोग इसमें जुटे. जितनी तेज़ी से जुटे उतनी तेज़ी से ग़ायब हो गए.

इस प्रयोग की कुछ उपलब्धियाँ भी हैं. वह जिस प्रत्यक्ष लोकतंत्र की परिकल्पना लेकर आई थी, वह छोटी यूनिटों में ही सम्भव है. गली-मोहल्लों के स्तर पर वह नागरिकों की जिन कमेटियों की कल्पना लेकर आई, वह अच्छी थी. इस मामले में मुख्यधारा की पार्टियाँ फेल हुई हैं.

Friday, January 18, 2019

वेब सीरीज पर नहीं दिखाया जाएगा आपत्तिजनक और भड़काऊ कंटेंट

ऑनलाइन वीडियो प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज के माध्यम से दिखाए जाने वाले आपत्तिजनक और भड़काऊ कंटेंट को अब नहीं दिखाया जा सकेगा। दरअसल, नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार, जियो, वूट, जी5, अरे, सोनीलिव, आल्ट बालाजी और इरोस नाउ ने सेल्फ-सेंसरशिप कोड साइन किया है, जिसके तहत इन प्लेटफॉर्म्स पर अब आपत्तिजनक और भड़काऊ कंटेंट नहीं दिखाया जा सकेगा। हालांकि, अमेजन, गूगल और फेसबुक ने इस कोड पर साइन करने से मना कर दिया है।

इस कोड के ड्राफ्ट को इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) ने तैयार करने में मदद की है, जिसके तहत न सिर्फ ऑनलाइन वीडियो प्लेटफॉर्म पर भड़काऊ और आपत्तिजनक कंटेंट दिखाने पर रोक लगाई जा सकेगी बल्कि लोगों की शिकायतों को दूर करने के लिए भी एक प्रणाली बनाई जाएगी। अगर इन नियमों पर सख्ती से पालन होता है तो अब नेटफ्लिक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर आने वाली वेब सीरीज में अश्लील कंटेंट नहीं दिखाया जाएगा।

इस तरह का कंटेंट नहीं दिखाया जा सकेगा
इस कोड के लागू होने के बाद ऑनलाइन वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर वो कंटेंट नहीं दिखाया जा सकेगा, जिसे भारतीय कोर्ट ने बैन किया हुआ हो। इसके अलावा, राष्ट्रीय प्रतीक और तिरंगे का अपमान करने वाला कंटेंट, आतंकवाद या हिंसा को बढ़ावा देने वाला कंटेंट और चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़ा कंटेंट दिखाना भी बैन होगा।

अगले गुरुवार को आएगा ड्राफ्ट, कुछ बदलाव भी संभव
ऑनलाइन वीडियो प्लेटफॉर्म के कंटेंट पर सेंसरशिप लगाने वाले इस ड्राफ्ट को तैयार करने वाले आईएएमएआई के अध्यक्ष सुभा रे ने बताया कि, इस ड्राफ्ट को अगले गुरुवार को सार्वजनिक किया जाएगा और इसमें अभी कुछ बदलाव भी किए जा सकते हैं। इसके साथ ही आईएएमएआई का ये भी कहना है कि इस कोड में भी इस बात का भी ध्यान रखा जाएगा कि कंटेंट क्रिएटर्स और आर्टिस्ट की रचनात्मक आजादी न छिने, साथ ही लोगों की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की आजादी का भी पालन हो।

अमेजन ने नहीं किए साइन, कहा- मौजूदा कानून ही पर्याप्त
हालांकि, प्राइम वीडियो सर्विस देने वाले अमेजन ने इस ड्राफ्ट पर साइन करने से मना कर दिया है। इसके पीछे कंपनी का कहना है कि जब तक सरकार की तरफ से कोई रेगुलेशन कोड नहीं आ जाता, तब तक वो ऐसे किसी कोड का पालन नहीं करेगी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेजन ने इस ड्राफ्ट पर साइन नहीं करने के पीछे मौजूदा कानून को ही पर्याप्त बताया है।

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) में उपाध्यक्ष रजनीश वैश का तबादला भी आदिवासी अनुसंधान संस्थान में कर दिया गया। वे भाजपा सरकार में 2008 से इन पदों पर चले आ रहे थे। पहली बार भोपाल कमिश्नर पद की कमान महिला आईएएस अधिकारी व आईजी पंजीयक रहीं कल्पना श्रीवास्तव को सौंपी गई है। इस फेरबदल को मुख्य सचिव एसआर मोहंती की नई टीम से जोड़कर देखा जा रहा है।

मोहंती के मुख्य सचिव बनने के बाद इस पद की दौड़ में रहे 1985 बैच के अधिकारी और जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव राधेश्याम जुलानिया ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए आवेदन कर दिया। इकबाल सिंह वल्लभ भवन से बाहर हो गए और रजनीश वैश्य को ट्राइबल रिसर्च की जगह भेज दिया गया।

इस समय वरिष्ठ अधिकारियों में 1983 बैच के मनोज कुमार गोयल रेवेन्यू बोर्ड में और 1984 बैच के एपी श्रीवास्तव प्रशासन अकादमी में पदस्थ हैं। 1984 बैच के पीसी मीणा भी मंत्रालय से बाहर हो गए हैं। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ और मुख्य सचिव मोहंती की सूची फाइनल होने से पहले शाम को फिर बातचीत हुई।

इसके पहले कमलनाथ की दिग्विजय सिंह से भी चर्चा हुई, जिसे इसी फेरबदल से जोड़कर देखा जा रहा है। बहरहाल, राज्य सरकार ने मंगलवार को बड़ा एवं बहुप्रतीक्षित बदलाव किया। प्रमुख सचिव अजीत केसरी की सहकारिता विभाग में वापसी हुई है। वर्तमान प्रमुख सचिव सहकारिता केसी गुप्ता को लघु उद्योग निगम में एमडी बनाकर भेजा गया है। स्वास्थ्य  का जिम्मा पल्लवी जैन गोविल को सौंपा गया है।

Thursday, January 10, 2019

जीएसटी से छूट की सीमा बढ़ाकर 40 लाख रु की, कंपोजीशन स्कीम की लिमिट अब 1.5 करोड़

जीएसटी काउंसिल ने छोटे कारोबारियों को राहत दी है। गुरुवार को काउंसिल ने जीएसटी रजिस्ट्रेशन से छूट के लिए सालाना टर्नओवर की लिमिट 20 लाख रुपए से बढ़ाकर 40 लाख रुपए करने का फैसला लिया।

जीएसटी काउंसिल के फैसले 1 अप्रैल से लागू होंगा

कंपोजीशन स्कीम के लिए सालाना टर्नओवर की लिमिट भी 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 1.5 करोड़ कर दी है। कंपोजीशन स्कीम के तहत आने वाले कारोबारियों को टैक्स हर तिमाही में जमा करवाना पड़ेगा लेकिन रिटर्न साल में एक बार भर सकेंगे। जीएसटी काउंसिल के फैसले 1 अप्रैल से लागू होंगे। कंपोजीशन स्कीम का फायदा लेने वाले कारोबारियों के लिए टैक्स की दर फिक्स होती है।

सर्विस सेक्टर को भी कंपोजीशन स्कीम का फायदा

सर्विस सेक्टर को भी राहत दी गई है। 50 लाख रुपए तक टर्नओवर वाले सर्विस प्रोवाइडर को कंपोजीशन स्कीम का फायदा मिलेगा।

केरल में आपदा सेस लागू होगा

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जीएसएटी काउंसिल की 32वीं बैठक के फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि केरल 2 साल तक अधिकतम 1% तक का आपदा सेस लगा सकेगा। पिछले साल आई बाढ़ से हुए नुकसान को देखते हुए यह प्रस्ताव दिया गया था।

फ्लैट खरीद पर जीएसटी घटाने के प्रस्ताव पर मंत्री समूह विचार करेगा

रिएल एस्टेट सेक्टर के लिए जीएसटी दर घटाने पर गुरुवार की बैठक में सहमति नहीं बन पाई। अंडर कंस्ट्रक्शन फ्लैट पर जीएसटी दर 12% से घटाकर 5% करने का प्रस्ताव था। इस पर विचार करने के लिए 7 सदस्यीय मंत्री समूह का गठन किया जाएगा। लॉटरी पर जीएसटी की दरों पर भी मंत्री समूह विचार करेगा।

वाराणसी प्रशासन ने शहर से दूर गांव में प्रवासियों के लिए 'टेंट सिटी' इसलिए बनाने का निर्णय लिया क्योंकि सात हजार प्रवासी भारतीयों के शिरकत के चलते वाराणसी के सभी होटल पहले से ही बुक्ड हो गए हैं. इसके होटल और 'टेंट सिटी' के अलावा वाराणसी के 550 लोगों ने अपने घरों के दरवाजे काशी आतिथ्य के तहत प्रवासी भारतीयों के लिए खोल दिया है. फिलहाल 'टेंट सिटी' में प्रवासी भारतीयों के लिए 50 विला रूम, फाइव स्टार सुविधा से युक्त 450 डीलक्स और 120 फैमली स्टे कॉटेज हैं. इसके अलावा प्रवासी भारतीयों के पूरी तरह से ग्रामीण जीवन और परिवेश का भी आनंद 'टेंट सिटी' के ऐढ़े गांव में मिलेगा.

गांववाले खुश

अपने गांव में 'टेंट सिटी' बनता देख ऐढ़े गांव के ग्रामीण बेहद खुश हैं. उन्होंने तो अभी से मन बना लिया है कि सभी ग्रामीण मिलकर पूरे गर्मजोशी के साथ बैंड बाजा और गजरे के फूल के साथ अपने गांव आने वाले प्रवासी भारतीयों का स्वागत करेंगे. इसका मकसद यही है कि जिस बेस कल्चर को प्रवासी देश छोड़कर गए हैं, वहीं उनको दिखाना है. ग्रामीणों ने खान-पान की भी विशेष व्यवस्था की योजना बनाई है, जिसमें बाटी, दाल, चोखा, दही-चू़ड़ा, मक्के की रोटी, गुड का तिलवा, खांड़ और मक्के-बाजड़े की रोटी भी मैन्यू में रखा गया है.

यह सारा खाना लकड़ी के चूल्हे पर गांव की औरते द्वारा बगैर किसी सरकारी मदद के बनाया जाएगा. ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनके गांव में बन रहे 'टेंट सिटी' में प्रवासियों के प्रवास के चलते उनके गांव के दिन भी बहुर जाएंगे. लोकसभा चुनाव के पहले यूपी में दो मेगा इवेंट के रूप में प्रयागराज के अर्धकुंभ और वाराणसी में होने वाले देश के 15वें प्रवासी भारतीय सम्मेलन को देखा जा रहा है. इन दोनों ही महाआयोजनों में हजारों-लाखों के हुजूम के जुटने वाले लोगों के दिलों को मौजूदा यूपी और केंद्र की सरकार तो छूना चाहती ही है, साथ ही साथ इनसे प्रभावित और लाभांवित होने वाले स्थानीय लोगों के लिए भी बीजेपी कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहती.

Thursday, January 3, 2019

अब पुलिस बैंड की धुन पर होगा वंदेमातरम्, मार्च भी निकाला जाएगा

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने फैसला किया है कि मध्यप्रदेश में पुलिस बैंड की धुन पर वंदेमातरम् होगा। इसके अलावा हर महीने के पहले कार्य दिवस पर सुबह 10:45 बजे पुलिस बैंड की धुन पर शौर्य स्मारक से वल्लभ भवन तक मार्च निकाला जाएगा। पुलिस बैंड के वल्लभ भवन पहुंचने पर राष्ट्र गान ‘जन गण मन’ और राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ होगा। कार्यक्रम में आम लोग भी शामिल किए जाएंगे।

राज्य में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद एक जनवरी को वंदेमातरम् का गायन नहीं हुआ था। इसे लेकर विवाद शुरू हो गया था। रोक लगने 24 घंटे बाद ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इसे कांग्रेस का शर्मनाक कदम बताया था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मध्यप्रदेश को तुष्टिकरण का केंद्र बना रही है। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल से पूछा था कि क्या वंदेमातरम् पर रोक का फैसला आपका है?

पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कहा...
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि वंदेमातरम् गायन पर कांग्रेस सरकार ने जनदबाव में निर्णय ले लिया है, लेकिन ये सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि #वंदेमातरम् रोकने के पीछे राहुल गांधी की मंशा थी या खुद मुख्यमंत्री कमलनाथ का निर्णय? इसका जवाब प्रदेश को मिलना ही चाहिए। मेरा मध्यप्रदेश सब देख रहा है।

उन्होंने कहा कि हम सभी 7 जनवरी को मंत्रालय परिसर में वंदेमातरम् का गायन करेंगे। आप सभी इसमें अवश्य शामिल हों। हमारी नजर अगले महीने की एक तारीख पर भी बनी रहेगी। कांग्रेस को समझना होगा कि वंदेमातरम् दलीय राजनीति से ऊपर है। सरकारों के आने-जाने से इसे प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

कमलनाथ ने कहा था- बड़े पैमाने पर होगा वंदेमातरम

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बुधवार को कहा था कि वंदेमातरम अब बड़े पैमाने पर होगा। शाह के बयान पर उन्होंने कहा था- ‘आजादी की लड़ाई के दौरान वंदेमातरम् गीत का अर्थ था, भारत मां को ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी से मुक्त कराना। उन्होंने कहा था कि आजादी के बाद भारत मां की वंदना का अर्थ है, किसानों की खुशियां, जो मैं कर्जमाफी और फसलों के दाम सुनिश्चित करके कर रहा हूं। सही अर्थों में मप्र की वंदना में लगा हूं। वंदेमातरम् कर रहा हूं।'

भाजपा विधायकों ने गाया वंदेमातरम

भोपाल में बुधवार को भाजपा जिलाध्यक्ष सुरेंद्रनाथ सिंह के नेतृत्व में विधायक विश्वास सारंग, रामेश्वर शर्मा समेत अन्य नेताओं ने मंत्रालय पहुंचकर वंदेमातरम् गाया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कहा था कि विधानसभा सत्र के पहले दिन 7 जनवरी को सभी विधायक सुबह 10 बजे पहले मंत्रालय के सामने मैदान में वंदेमातरम् का गायन करेंगे।